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बहुत नाशुक्रा काम है समीक्षा करना( Date : 17-05-2015)


बहुत नाशुक्रा काम है समीक्षा करना

अखबारी दुनिया में जिस किसी को ठिकाने लगाना हो, उसे अखबारों की समीक्षा का काम दे देते हैं। मुझे भी एक बार अमर उजाला, मेरठ में और एक बार अमर उजाला, देहरादून में समीक्षा का काम करना पड़ा। तथाकथित समीक्षकों को अखबार में छपी भाषायी, तथ्यात्मक और प्रस्तुति संबंधी गलतियों को छांटकर रिपोर्ट तैयार करनी होती है। इस रिपोर्ट के बाद संबंधित लोगों को संपादक की ओर से चेतावनी-पत्र जारी किए जाते हैं। कई बार गलतियों को आधार बनाकर रिपोर्टरों या डेस्ककर्मियों को चलता भी कर दिया जाता है। इसीलिए समीक्षा के काम को बेहद नकारात्मक और बदला भांजने वाली गतिविधि के तौर पर देखा जाता है। पिछले कुछ सालों में अखबारों के भीतर समीक्षा के काम को इस रूप में बदल गया है कि रिपोर्टिंग का इंचार्ज अपने समकक्ष डेस्क इंचार्ज के काम की समीक्षा करता है और डेस्क का इंचार्ज रिपोर्टिंग की समीक्षा करके संपादक को सौंपता है। इन्हीं रिपोर्टाें के ंआधार पर संपादक रिपोर्टिंग और डेस्क, दोनों को पेंच कसता रहता है। पुरानी आदतों के चलते मैं आज भी अखबार, टीवी या पत्रिकाएं देखता हूं तो यकबक गलतियां पकड़ में आने लगती हैं। मेरी इस आदत के कारण पिछले दिनों अमर उलाला, देहरादून के समाचार-संपादक ओमप्रकाश तिवारी नाराज भी हो गए थे। लेकिन, ये ऐसा अभ्यास है कि एक बार पड़ जाए तो फिर छूटता नहीं है। पिछले दिनों के कुछ ऐसे ही मामले सामने हैं-

एशियाई खेल अफ्रीका में!
यकीन कीजिए, इस बार एशियाई खेल अफ्रीका में होंगे। ये बात मैं नहीं, अमर उजाला बता रहा है। 3 अगस्त, 2014 के अमर उजाला में स्पोर्ट्स पेज पर एक खबर छपी है-नेतृत्व करेंगे पेस और सानिया। इस खबर में लिखा गया है, आगामी सितंबर-अक्तूबर में दक्षिण अफ्रीका में होने वाले एशियाई खेलों में भारतीय दल का नेतृत्व पेस और सानिया करेंगे। इस सूचना के उलट, हम जैसे आम पाठकों को तो यही पता है कि इस बार के एशियाई खेल दक्षिण कोरिया में होंगे। असल में, इस खबर में संवाददाता ने रौ में बहकर दक्षिण कोरिया को दक्षिण अफ्रीका लिख दिया। संभवतः संवाददाता दक्षिण से भ्रमित हो गया। शुक्र है दक्षिण सूडान नहीं लिखा, क्योंकि इस देश के नाम में भी दक्षिण है।
दो अगस्त को रविवार था। शाम का खाली वक्त समाचार-चैनल देखकर बिताया। टीवी चैनलों पर शब्दों के प्रयोग देखकर काफी मनोरंजन हुआ। इंडिया टीवी पर रात नौ बजे के बुलेटिन में एंकर मीनाक्षी बताती रही कि कल यानि आज श्रावण मास का प्रथम सोमवार है और इस प्रथम सोमवार को मोदी पशुपतिनाथ मंदिर में पूजा करने जाएंगे। एंकर के लिए प्रथम और अंतिम एक ही है। इसी स्थिति को संभवतः सिद्धावस्था कहते हैं! जब, प्रथम और अंतिम में कोई अंतर न रह जाए।

आईबीएन7 और श्रद्धालुओं का झुंड
आईबीएन7 पर भी कई चमत्कार देखने-सुनने को मिले। रात नौ बजे के बुलेटिन में एंकर ने बताया कि कश्मीर के कौसर नाग झील क्षेत्र में धार्मिक यात्रा पर जा रहे 200 लोगों के झुंड को रास्ते में रोक दिया गया है। एंकर ने इस समूह के लिए झंुड का प्रयोग किया। जैसे, ये श्रद्धालु भेड़-बकरी हों। लोगों को चैनल का आभारी होना चाहिए कि उसने इन लोगों को गिरोह नहीं बताया। इसी समाचार में बाइट दे रहे रिपोर्टर ने जम्मू-कश्मीर को दो प्रांत बताया। इसी बुलेटिन में एंकर ने दर्शकों का ज्ञान बढ़ाया कि गाजा में इजराइली हमले में यूएन स्कूल पर बमबारी में सैंकड़ों बच्चे मारे गए हैं। अब आप अनुमान लगाने के लिए स्वत्रंत हैं कि मरने वालों की संख्या 100 थी या 999 या इससे भी ज्यादा!

राहुल और प्रियंका अभी बच्चे!
हम जैसे सामान्य लोग 40 पार करने पर खुद को अधेड़ मानने लगते हैं। दो बच्चों की मां बन चुकी 40-42 की लड़की को परिपक्व औरत माना जाना लगता है। लेकिन, राहुल गांधी और प्रियंका के मामले में मीडिया ऐसा नहीं मानता। एक अगस्त को एनडीटीवी पर प्राइम टाइम में नटवर ंिसह का इंटरव्यू लिया जा रहा था। एंकर पता नहीं किस भाव में था कि राहुल और प्रियंका को बच्चे, बच्चा और दोनों बच्चे कहकर बातचीत में उनका उल्लेख कर रहा था। मीडिया की निगाह में 40-44 साल के अधेड़ लोग बच्चे हैं। दो किशोरवय बच्चों की मां प्रियंका भी बच्ची हैं!!! मीडिया प्रायः सूडो-गार्जियनशिप का शिकार रहता है। इंटरव्यू ले रहे एंकर की उम्र भी 50 से ज्यादा नहीं होगी, लेकिन राहुल और प्रियंका उनके लिए बच्चे थे। एनडीटीवी-हिंदी की छवि दूसरे चैनलों की तुलना में बेहतर है, लेकिन इस पर चैनल पर नटवर ंिसह का इंटरव्यू इतने बिखरे हुए ढंग से लिया गया कि इसका प्रसारण न किया जाता तो ज्यादा अच्छा रहता। नटवर ंिसह जैसे मंझे हुए राजनेता का साक्षात्कार करने के लिए अच्छी तैयारी की जरूरत पड़ती है, जिसका अभाव एनडीटीवी पर दिख रहा था।

सहारनपुर दंगा और मजेदार बात.......
क्या दंगे की खबर को लिखते वक्त तथ्यों का ब्योरा प्रस्तुत करना मजेदार बात हो सकती है ? आपकी तरह ही मेरा जवाब भी ना ही है। लेकिन, हिन्दुस्तान अखबार ऐसा नहीं मानता। हिन्दुस्तान में दंगे की खबरें पढ़ रहा था, 27 जुलाई, 2014 के उत्तराखंड संस्करण में पेज 10 पर छपी खबर �विवादित निर्माण का नक्शा एसडीए से स्वीकृत नहीं था� के कंटेंट को देखकर परेशान हो गया। इस खबर में संवाददाता लिखता है-�मजेदार बात यह है कि जिस समय यहां के अधिकारी दो लोगों के मरने की पुष्टि कर रहे थे, उसी वक्त लखनउ में अपर पुलिस महानिदेशक कानून-व्यवस्था मुकुल गोयल तीन लोगों के मरने की पुष्टि कर रहे थे।�
उपर्युक्त वाक्य में �मजेदार बात है� का प्रयोग देखिए। पता नहीं संवाददाता ने किस रौ में बहकर इन शब्दों का प्रयोग किया। संवाददाता उस विसंगति की ओर इशारा कर रहा था जिसमें दो अफसर मरने वालों की संख्या का अलग-अलग ब्यौरा दे रहे थे। लेकिन, शब्द लिख रहा था-�मजेदार बात है�। यकीनन, इस जगह पर �मजेदार� लिखा-पढ़ा जाना बेहद चिंताजनक है। उपर्युक्त वाक्यों में एडीजी मुकुल गोयल का पदनाम भी हास्यास्पद ढंग से लिखा गया है। अपर पुलिस महानिदेशक कानून-व्यवस्था मुकुल गोयल के लिए केवल एडीजी लिखा जाता तो पाठक पर ज्यादा मेहरबानी होती!
इसके अलावा हिन्दुस्तान ने भाषा के मामले में एक और अवांछित प्रयोग किया। 
इस अखबार में जुलाई, 2014 में जितनी बार भी संघ लोक सेवा आयोग से संबंधित खबरें प्रकाशित हुई, उन सभी खबरों में छात्र शब्द का प्रयोग किया गया। जो युवा प्रतियोगी परीक्षा में बैठ रहे हैं, अफसर बनने जा रहे हैं वे छात्र हैं ? सामान्य समझ तो यही कहती है कि किसी शैक्षणिक संस्था में अध्ययरन बच्चे अथवा युवा ही छात्र कहलाते हैं। जो किसी प्रतियोगी परीक्षा में शामिल हो रहे हैं वे प्रतिभागी, प्रतिस्पर्धी, प्रत्याशी, उम्मीदवार आदि तो हो सकते हैं, लेकिन उनके लिए छात्र शब्द का प्रयोग किसी भी प्रकार से ठीक नजर नहीं आता। इस प्रकरण में डीडी न्यूज पर प्रसारित हिंदी समाचारांे में भी छात्र शब्द का ही प्रयोग किया जाता रहा। जबकि, अंग्रेजी बुलेटिन इन्हें एस्पीरेंट यानी प्रत्याशी कहा गया, वहां स्टूडेंट का प्रयोग नहीं किया गया। यह बात ठीक है कि मीडिया जल्दबाजी में लिखा गया साहित्य है, लेकिन ऐसी भी क्या जल्दबाजी कि अर्थ का अनर्थ हो जाए!



वरिष्ठ  पत्रकार और शिक्षक सुशील   उपाध्याय    के एफबी वॉल से 



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