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मुझे उम्मीद है कि हमारा मीडिया इसको भरपूर जगह देगा. !
( Date : 12-10-2015)

दी कविता के दो बड़े हस्ताक्षर मंगलेश डबराल और राजेश जोशी ने भी दादरी कांड और कलबुर्गी की हत्या के विरोध में साहित्य अकादमी सम्मान लौटाने का फैसला किया है. मौजूदा दौर में भारत के सबसे मजबूत सवालों औऱ चिंताओं से लगातार टकराते रहनेवाले कवियों की जमात में अगली पांत के साहित्यकार हैं मंगलेश डबराल औऱ राजेश जोशी. इससे पहले धुरंधर साहित्यकार उदय प्रकाश से लेकर कृष्णा सोबती तक, जबरदस्त मौलिकता वाले मलयाली कवि के सचिदानंदन से लेकर सारा जोसफ तक और पंजाबी के नाटककार आतमजीत सिंह से लेकर साहित्यकार गुरचरन भुल्लर तक ने देश में बढते फासीवाद-कट्टरवाद और दक्षिण भारतीय साहित्यकार केएम कलबुर्गी की हत्या के खिलाफ साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटा दिए हैं. अर्से बाद देश के साहित्यकारों ने उस मोर्चे पर सक्रियता दिखाई है जिसपर उनको हर बड़े सवाल को लेकर दिखाना चाहिए. बंद कमरों, वाचनालयों और सम्मान समारोहों में रच-बस गयी रचनाकारों की जमात की तंद्रा टूटी है- ये शुभ संकेत है. देश के तमाम हलकों में किसी विवाद को लेकर कोहराम मचा रहता है तब भी हमारा साहित्य समाज रचनाधर्म की रामनामी लपेटे काल-समय को कोसनेवाली लेखनी को रगड़ता रहता है. रोने धोने और कोसने की रचनाओं ने जैसे विरोध और बगावत वाला औज़ार ही सड़ा दिया है. अब, देश की अलग अलग भाषाओं के साहित्यकारों का एक मोर्चा तैयार होना औऱ लंपट-आपराधिक तत्वों के खिलाफ व्यवस्था को झकझोरने की मजबूत कोशिश करना बेहतर शुरुआत है. समाज के मोर्चे से दूर कोठरियों से अपने रिश्ते को ही उचित मानकर चलने से साहित्यकारों-रचनाकारों ने इस देश में रोड मॉडल की हैसियत कभी नहीं पाई. पश्चिम के देशों में लेखकों का रुतबा और लोगों में उनको लेकर दिलचस्पी काफी रही है. यह आज भी है. हमारे यहां सरकारें तो उन्हें कई खानों-खेमों में बांटकर अपना उल्लू सीधा करती ही रही हैं, समाज और मीडिया की जरुरतों से खुद को दूर रखकर हमारे रचनाधर्मी वर्ग ने भी अपना बहुत कुछ बिगाड़ा है. एक रोज कलबुर्गी की हत्या, एक रोज गुलाम अली के शो पर धमकी, एक रोज महमूद कसूरी की किताब के विमोचन से पहले सुधींद्र कुलकर्णी के चेहरे को काला करना- ये सब एक सिलसिले में चल रहा है. कल किसकी बारी आएगी कहा नहीं जा सकता. इसलिए वाजिब बात पर अगर आपका समर्थन है तो गैरवाजिब बात पर आपका पुरजोर विरोध भी होगा. इस बार देश का लेखक वर्ग जागा है और मुझे उम्मीद है कि हमारा मीडिया इसको भरपूर जगह देगा. 
वे पहले यहूदियों को मारने आए
और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था।
फिर वे साम्यवादियों को मारने आए
और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था।
फिर वे श्रमिकसंघियों को मारने आए
और मैं चुप रहा क्योंकि मैं श्रमिकसंघी नहीं था।
फिर वे मुझे मारने आए
और मेरे लिए बोलने वाला कोई रह नहीं गया था।


वरिष्ठ पत्रकार राणा  यशवंत    के एफबी वॉल से  



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