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मैंने भी 15 साल पहले अपना बेटा खोया है .
( Date : 01-10-2015)

मैंने भी 15 साल पहले अपना बेटा खोया है ...तीन दिनों से बार बार ऐसी ख़बरें देखकर मुझे मेरा आभास याद आ रहा है ...बार - बार आंखे छलछला रही है ..आंखों के गीलेपन को छुपा ले रहा हूं लेकिन अपने भीतर ही दर्द का समंदर उमड़ रहा है ..उसका क्या करुं यार ...मेरा बेटा भी अमन जैसा ही तो था ..करीब करीब उसी की उम्र का भी ...
अपनी आँखों के सामने अपने बच्चे या परिजन के गुजर जाने का दर्द माँ -बाप या परिवार वाले ही समझ सकते हैं ...न केजरीवाल समझ सकते हैं ,न मोदी ,न ये सिस्टम ,न ये अस्पताल ... समझते तो दिल्ली जैसे शहर में लोग यूँ न मर रहे होते और अस्पतालों में इलाज़ के लिए यूँ धक्के न खा रहे होते ...
मेरा बेटा आज 22 साल का होता अगर यूँ ही एक अस्पताल में डॉक्टरों की लापरवाही का शिकार न हो गया होता .मलेरिया हो गया था उसे ...5 दिन तक दिल्ली के एक बड़े अस्पताल के ICU में एडमिट रहा और एक दिन हमें ज़िन्दगी भर का दर्द देकर चला गया ...मेरी आँखों के सामने वो हमें छोड़कर हमेशा के लिए जा रहा था और हम रोने -धोने और डॉक्टर को कोसने के अलावा कुछ नहीं कर पा रहे थे ..
उसने कुछ ही घंटे पहले कातर और नासमझ नजरों से मेरी ओर देखते हुए मुझसे पूछा था -पापा ...मैं स्कूल कब से जा पाउंगा ? 
मैंने कहा था -एक दो दिन में हम आपको घर ले चलेंगे ,उसके बाद ..तब न हमें पता था ,न उस मासूम को की हमारे और उसके बीच ये आखिरी संवाद है ..
मैं हर रोज़ डॉक्टर से जूझता था . पूछता था की मेरा बेटा ठीक तो हो जाएगा न ? सब कहते -ठीक हो जाएगा ...हर रोज अस्पताल मोटे बिल हमें थमाता और कहता कि दो चार दिन में सुधार होने लगेगा ..लेकिन उसकी हालत अचानक बिगड़ने लगी और ऐसी बिगड़ी कि हम उसे किसी दूसरे अस्पताल में शिफ्ट नहीं कर सकते थे ...तब वही डाक्टर इधर - उधर नजरें चुराकर बचने लगे.पांच दिन तक डाक्टर ये ही तय नही कर पा रहे थे कि उसे हुआ क्या है . कभी कोई कालाजार बोलता..कभी मलेरिया ..कभी कुछ ..कभी कुछ ...
.मुझे उन डाक्टर्स के चेहरे याद हैं , जो आईसीयू में हंसते - मुस्कुराते आते और गंभीर मरीजों को मशीनी अंदाज में देखकर आपस में ठहाके लगाते चले जाते ...एक दिन ऐसे ही कुछ रेेजिडेंट डाक्टर्स को मैंने बहुत डांटा था ...कि आपको थोड़ी भी संवेदना नहीं है ..इस आईसीयू में सबके परिजन अपनों के लिए परेशान हैं , उनकी सलमाती की दुआ कर रहे हैं और आप ठहाके लगा रहे हैं ....
कुछ ऐसा ही तजुर्बा अमन के पिता का भी है ...
अमन के पिता अपने जिगर के टुकड़े के इलाज़ के लिए लिए एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल भटकते रहे ..और देखते देखते उनका बेटा चला गया ..
अमन के पिता ने इंडिया टीवी को बताया कि सफदरजंग अस्पताल में नर्सों ने जब उससे कहा कि एक तुम्हारा ही बच्चा नहीं मरा जा रहा है ..बहुतों के बच्चे हैं ...तो उससे रहा नहीं गया . उसे अपनी हालत पर तरस आया लेकिन नर्सें आपस में हंसती रहीं- ठहाके लगाती रहीं ...एक लाचार पिता वहां से अपने मासूम को लेकर दूसरे अस्पताल चला गया ..लेकिन उसे अस्पतालों ने मिलकर मार दिया ....
दिल्ली में अगर ये हाल तो आप समझ सकते हैं देश के दूर दराज इलाकों का क्या हाल होगा...दिल्ली में हर रोज मरने और बीमार होने की खबरें आ रही हैं तो पूरी सरकार मिलकर भी दवा - चेकअप और बेड का इंतजाम क्यों नहीं कर पा रही है ...दिल्ली सरकार नहीं कर पा रही तो केन्द्र सरकार क्या कर रही है ...कहां हैं केजरीवाल जी ...मोदी जी ...फलां जी और फलां जी ...



वरिष्ठ पत्रकार अजीत   अंजुम के एफबी वॉल से 



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