MediaManch-No.1 News Media Portal
अपनी ख़बर मीडिया मंच को भेजें

मेल आई डी: newsmediamanch@gmail.com
News Flash                  आप अपनी खबर newsmediamanch@gmail.com पर मेल करें।    
MediaManch-No.1 News Media Portal
मीडिया मंच टॉप 20
उदाहरण
"वो गाली दे रहा था रहा लेकिन मैं ले नहीं रहा था "
विस्तार से
यादें
'सनसनी' के १० साल
विस्तार से
अनुभव
बहुत नाशुक्रा काम है समीक्षा करना
विस्तार से
वार्षिक फ़िल्म समीक्षा
साल 2013-मेरी पसंद की 12 फिल्में -अजय ब्रह्मात्‍मज
विस्तार से
न्यूज़ ज़ोन
नवभारत टाइम्स
बीबीसी हिंदी
नईदुनिया
हिंदुस्तान दैनिक
प्रभात ख़बर
दैनिक भास्कर
दैनिक जागरण
अमर उजाला
हलचल
कमरे से बाहर आना होगा कानून को( Date : 09-11-2014)

-


पिछले दिनों ईरान में 26 वर्षीय युवती रेहाना जब्बारी को ईरान की एक अदालत के आदेश पर फांसी पर लटका दिया गया। उसका गुनाह मात्र इतना था कि जब वह 19 साल की थी तो उसने साथ बलात्कार का प्रयास करनेवाले एक शख्स को उसने चाकू घोंप कर मौत के घाट उतार दिया था। बलात्कार का प्रयास करने वाला शख्स मुर्तजा अब्दोआली सरबंदी ईरानी खुफिया विभाग में कार्यरत था। रेहाना को उसकी आबरू की रक्षा करने की कीमत जान देकर अदा करना करनी पड़ी। 

ईरान ने दुर्दांत कानून का उदाहरण पेश करते हुए उस युवती को फांसी पर लटका दिया। पिछले सात सालों से अपने इस गुनाह की सजा काट रही रेहाना की ईरानी कानून ने एक न सुनी। यहां तक कि अंतराष्ट्रीय दबावों व विश्व भर के मानवाधिकार संगठनों के तमाम प्रयासों व सोशल मीडिया पर चल रहे कैंपेनों के बावजूद भी उसको बचाया नहीं जा सका। रेहाना की फांसी रोकने के लिए मानवाधिकार संगठनों द्वारा पिछले महीने ट्विटर और फेसबुक पर कैंपेन शुरू किया गया था। इस कैंपेन से कुछ वक्त के लिए रेहाना की फांसी टाल दी गई थी। हालांकि उसने अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए न कोई दलील दी बल्कि न ही उसने कोर्ट में चीखना,चिल्लाना व गिड़गिड़ाना मुनासिब समझा। शायद उसे अपने देश के न्याय का भरोसा था। फांसी देने के बाद कोर्ट ने सफाई पेश करते हुए कहा था कि पीडि़त परिवार के सदस्यों ने रेहाना को माफ करने से इंकार कर दिया था, इसलिए उनकी सजा बरकरार रखी गई। 


इसके ठीक दो दिन बाद इस्लामिक इस्टेट ने कुर्दिश महिला का सर कलम कर दिया। संयोग से उसका भी नाम रेहाना ही था। रेहाना ने करीब 100 आईएस आतंकियों को मार गिराया था। उसके इस गुनाह की सजा आईएस ने उसका सर कलम कर के दी।  अगर इन दोनो मामलों में देखा जाए तो आईएस और ईरान के कानून में ज्यादा कोई फर्क  नजर नहीं आता। बस फर्क इतना है कि आईएस ने सजा देने में ज्यादा वक्त नहीं लिया जबकि ईरान को सजा देने में 7 साल लग गए।

सरबंदी की हत्या के जुर्म में 2007 में गिरफ्तार रेहाना जब्बारी ने ईरान की जेल से अपनी मां के नाम एक पत्र लिखा था जो कि उसकी फांसी के एक दिन बाद जारी कर दिया गया। इस पत्र में लिखी गई बातें रह रह कर लोगों को, उसे जीते जी मौत के घाट उतारने वाले ईरानी कानून को समय-समय पर चुभती रहेंगी। उसका यह पत्र दुनिया को एक सबक दे गया। अपने जीते जी वह उसने जो किया अब उसकी जिम्मेदारी दुनिया के बाकी लड़कियों-महिलाओं पर हैँ। अब बात शुरू हुई है तो इंसाफ मिल कर ही खत्म होनी चाहिए।

इस पूरे वाकये को याद कर 2011 में आई पाकिस्तानी फिल्म बोल की धुंधली पड़ती यादें फिर से ताजा हो गईं। इस फिल्म में  पाकिस्तानी अदालत एक ऐसी लड़की को सजा-ए-मौत देती है जिसने अपने पिता के गुनाहों से आजिज आकर एक दिन उनकी हत्या कर देती है। लड़के की चाहत में उसके पिता एक-एक कर १४ संतानो को जन्म देते हैं। उनकी चौदहवीं संतान लड़के और लड़की के बीच की होती है। जिसकी  जवानी के दिनों में वह उसकी उसकी हत्या कर देता है। इस फिल्म ने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया था। 

लाहौर कि रहने वाली एक लड़की जुनैब पर उसके अपने पिता को मार डालने का आरोप होता है। जुनैब ने आज तक किसी भी अदालत में अपना कोई बयान नहीं दिया। अंत में उसका मामला पाकिस्तान के वजीर-ए-आज़म के पास पहुँचता है। यह समझ कर के शायद उसने आजतक कुछ नहीं कहा अपने बचाव में इसलिए वो वाकई में आरोपी है, आज़म उसकी मौत पर मुहर लगा देते हैं। पर उसने आखिर में एक अपील कि है के फांसी कि तख्ते पर खड़ी हो कर वह मीडिया को अपनी कहानी सुनाना चाहती है। हांलाकि कहानी सुनाने  के बाद भी उसकी सजा नहीं रुकती लेकिन उसने अपनी कहानी से पाकिस्तानी  औरतों पर हो रहे अत्याचारों, जुल्मों की वो दर्दनाक कथा बयां कि है जो कि शायद इसके पहले कभी की गई हो। उसने बिना किसी मलाल के फांसी के फंदे को चूम कर हमेशा के लिए सो गई, लेकिन पूरी दुनिया को गहरी नींद से जगा गई।


इन दोनों रील और रियल लाइफ के अदालती मामलों में मुस्लिम देशों के कानून को की निर्जीविता की झलक साफ दिखलाई देती है। कानून कब तक अंधा न्याय करता रहेगा। लीक हटकर कानून को पुन: संशोधित करने की जरूरत है। समय के साथ-साथ अपराधों किस्म भी बदल गई हैं, लेकिन कानून दशकों पुराने ढर्ऱो पर अडिग़ है। मुस्लिम देशों के कानून को बदलाव के लिए अदालती कमरे से बाहर निकलना होगा। अगर इसी तरह के न्याय होते रहे तो जल्द ही वह दिन आएगा जब इन देशों के कानून और आईएस सरीखे संगठनों के बीच की खांई पट जाएगी। समय रहते अगर सही कदम नहीं उठाए गए तो भविष्य में हालात भयावह हो सकते हैं।
प्रशांत सिंह
08109555764
हलचल



First << 1 2 3 4 5 >> Last



नमूना कॉपी पाने या वार्षिक सदस्यता के लिए संपर्क करें +91 9860135664 या samachar.visfot@gmail.com पर मेल करें.
Media Manch
मीडिया मतदान
Que.



Result
MediaManch-No.1 News Media Portal