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मानवतावादी रचनाकार विष्णु प्रभाकर( Date : 11-04-2015)

डॉ. सौरभ मालवीय

कालजयी जीवनी आवारा मसीहा के रचियता सुप्रसिद्ध साहित्यकार विष्णु प्रभाकर कहते थे कि एक साहित्यकार को केवल यह नहीं सोचना चाहिए कि उसे क्या लिखना हैबल्कि इस पर भी गंभीरता से विचारकरना चाहिए कि क्या नहीं लिखना है.  वह अपने लिखने के बारे में कहते थे कि प्रत्येक मनुष्य दूसरे के प्रति उत्तरदायी हैयही सबसे बड़ा बंधन है और यह प्रेम का बंधन हैउन्होंने लेखन को नए आयामप्रदान किए.  उनके लेखन में विविधता हैजीवन का मर्म हैमानवीय संवेदनाएं हैंअपनी साहित्यिक शक्तियों के बारे में उनका कहना थामेरे साहित्य की प्रेरक शक्ति मनुष्य हैअपनी समस्त महानता और हीनता केसाथअनेक कारणों से मेरा जीवन मनुष्य के विविध रूपों से एकाकार होता रहा है और उसका प्रभाव मेरे चिंतन पर पड़ता हैकालांतर में वही भावना मेरे साहित्य की शक्ति बनीत्रासदी में से ही मेरे साहित्य का जन्म हुआ.वह मानतावादी थेवह राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के दर्शन और सिद्धांतों से प्रभावित थेवह कहते थेसहअस्तित्व में मेरा पूर्ण विश्वास हैयही सहअस्तित्व मानवता का आधार हैइसीलिए गांधी जी की अहिंसा में मेरीपूरी आस्था हैमैं मूलतमानवतावादी हूं अर्थात उत्कृष्ट मानवता की खोज ही मेरा लक्ष्य हैवर्गहीन अहिंसक समाज किसी दिन स्थापित हो सकेगा या नहींलेकिन मैं मानता हूं कि उसकी स्थापना के बिना मानवता काकल्याण नहीं हैउनकी रचनाओं में लोक जीवन की सुगंध हैउदाहरण देखिएयह कैसी ख़ुशबू हैक्या यह ईख के खेतों से तो नहीं  रही?  हांयह वही से  रहीयह भीनी-भीनी गंध और वहउधर मकई के खेतों सेआने वाली मीठी-मीठी महक.

 

विष्णु प्रभाकर का जन्म 21 जून, 1912 को उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर ज़िले के गांव मीरापुर में हुआउनका असली नाम विष्णु दयाल थाउनका पारिवारिक वातावरण धार्मिक थाजिसका उनके मन पर गहराप्रभाव पड़ाउनके पिता दुर्गा प्रसाद धार्मिक विचारों वाले व्यक्ति थेउनकी माता महादेवी शिक्षित महिला थींजो कुपर्थाओं का विरोध करती थींउन्होंने पर्दाप्रथा का भी घोर विरोध किया थाविष्णु प्रभाकर कीपत्नी सुशीला भी धार्मिक विचारधारा वाली महिला थींविष्णु प्रभाकर का बाल्यकाल हरियाणा में गुज़र. उन्होंने वर्ष 1929 में हिसार के चंदूलाल एंग्लो-वैदिक हाई स्कूल से दसवीं की परीक्षा उत्तीर्ण की.तत्पश्चात् परिवार की आर्थक तंगी के कारण उन्होंने पढ़ाई के साथ-साथ नौकरी भी कर लीवह चतुर्थ वर्गीय कर्मचारी के तौर पर काम करते थेउस समय उन्हें प्रतिमाह 18 रुपये मिलते थे. उन्होंने पंजाबविश्वविद्यालय से भूषणप्राज्ञविशारदप्रभाकर आदि की हिंदी-संस्कृत परीक्षाएं उत्तीर्ण कीं. उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय से ही स्नातक भी किया. उनकी पहली कहानी 1931 में हिंदी मिलाप मेंप्रकाशित हुईइस कहानी को बहुत सराहा गयापरिणामस्वरूप उन्होंने लेखन

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