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लोकेन्द्र सिंह का पहला काव्य संग्रह 'मैं भारत हूं' शीघ्र प्रकाश्य( Date : 03-02-2015)

मध्यप्रदेश साहित्य अकादमीभोपाल के सहयोग से हो रहा है प्रकाशित

ग्वालियर2 फरवरी2015 युवा साहित्यकार लोकेन्द्र सिंह का पहला काव्य संग्रह 'मैं भारत हूं' शीघ्र ही प्रकाशित होकर आने वाला है। पुस्तक मध्यप्रदेश साहित्य अकादमीभोपाल के सहयोग से प्रकाशित हो रही है। इस संग्रह में उनकी चुनिंदा कविताएं शामिल हैं। ये कविताएं राष्ट्रप्रेमसामाजिक दायित्व और मानवीय रिश्तों के गहरे भाव को समेटे हुए हैं। उनके काव्य संग्रह की प्रस्तावना देश के प्रख्यात साहित्यकार एवं प्रेमचंद सृजनपीठउज्जैन के निदेशक श्री जगदीश तोमर ने लिखी है। पुस्तक का आवरण राजा मानसिंह संगीत एवं कला विश्वविद्यालयग्वालियर के असिस्टेंट प्रोफेसर श्री बलवंत सिंह भदौरिया ने तैयार किया है।

            कवि लोकेन्द्र सिंह मूलत: ग्वालियर निवासी हैं। वर्तमान में वे माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालयभोपाल में कार्यरत हैं। इसके पूर्व उन्होंने सक्रिय पत्रकारिता में लम्बा समय बिताया है। ग्वालियर से प्रकाशित दैनिक स्वदेश से उन्होंने अपने पत्रकारीय जीवन की शुरुआत की। इसके बाद दैनिक भास्करपत्रिका और नईदुनिया में विभिन्न पदों पर रहकर कार्य किया। सोशल मीडिया में भी उनकी सक्रियता बनी रहती है। 'अपनापंचूब्लॉग के माध्यम से वे ब्लॉग लेखन से जुड़े हैं। साहित्य और पत्रकारिता में सार्थक योगदान के लिए लोकेन्द्र सिंह को दिल्ली की शोभना वेलफेयर सोसायटी और राष्ट्रीय पत्र लेखक मंच सहित अन्य संस्थाएं सम्मानित कर चुकी हैं।

            अपने पहले काव्य संग्रह के संबंध में कवि लोकेन्द्र सिंह कहते हैं कि 'मैं भारत हूंकाव्य संग्रह में संकलित कविताएं'औरों से अलग भारतका दर्शन कराने का प्रयास करती हुईं आपको दिखेंगी। हो सकता है कि ये कविताएं काव्य के व्याकरण के नजरिये से गलत होंअधूरी हों। दरअसलये कविताएं मेरे कोमल अन्त:स्थल से बहकर निकली हैं। इसलिए मेरे लिए ये पूर्ण हैंउस बालक के अधूरे संवादों की तरह जो अभी बोलना सीख रहा हैअस्पष्ट और अधूरे वाक्य बोलता है लेकिन उस बालक को सुनने वाले बखूबी समझते हैं उसके भाव और उसकी अभिव्यक्ति को। मैं अपने देश के अतीत के स्वर्णिम पृष्ठों पर गर्व करता हूंउसके वर्तमान को कुछ बेहतर बनाने की बात करता हूं और उसके उज्ज्वल भविष्य के स्वप्र बुनता हूं। मेरा देश मेरे लिए महज भूगोल नहीं हैवह जीता-जागता देवता है और अपने देवता की स्तुति में ही मैंने ये कविताएं और गीत रचे हैं। उनका मानना है कि साहित्य सकारात्मक सामाजिक बदलाव के लिए है। साहित्यकारों को इस उद्देश्य को ध्यान में रखकर अपनी कलम चलानी चाहिए।

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