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रेडियो एफ एम
रेडियो को शुरू हुए 87 साल हो गए ( Date : 23-07-2014)

दर्जी, लुहार, बढ़ई,कारीगर और खुद अपने पापा को बचपन से जिस रेडियो के बीच रमते-काम करते देखता आया हूं, अक्सर सोचता हूं कि अगर ये रेडियो इनकी जिंदगी में नहीं होता तो क्या ये तब भी ब्लाउज की बांह पर मशीन चलाते वक्त बिल्कुल अपने काम से अलग मनोभावों में खो जाते. पूरे शरीर से तर-बतर पसीना आते रहने के बीच भी लुहार मुस्करा रहा होता और लकड़ी को बेतहाशा छिलते जाने के बीच अचानक से एक बीड़ी सुलगाता और गुनगुनाने लग जाता- पत्थर के सनम अरे हमने, मोहब्बत का खुदा जाना और प्राण का मिजाज लिए मेरे पापा..जब-तब तरल हो जाते.

रेडियो को शुरू हुए 87 साल हो गए 
आज ही के दिन( 23 जुलाई) शुरु हुए रेडियो के कुल 87 साल हो गए. हिन्दुस्तान में अलग-अलग संदर्भों से इसका एक अपना और लगभग व्यवस्थित इतिहास है लेकिन कोई जाकर सत्तर साल के उन दर्जियों से, इतनी ही उम्र के बढ़ई, लुहारों,चटाई बुननेवाले कामगारों और साड़ी का काम करनेवाले फनकारों से पूछे कि अगर ये रेडियो न होता तो आपके काम पर क्या असर पड़ता ? दिलचस्प अनभव और स्टोरी निकलकर आएगी. आपने कभी गौर किया है- उनकी सिलाई मशीन, हथौड़े, लकड़ी छीलनेवाली मशीन के आगे रेडियो की आवाज दब जाती है, हमें और आपको कुछ भी सुनाई नहीं देता लेकिन इसी शोर और रेडियो के बीच एक तीसरी धुन बनती है जो काम कर रहे इन कारीगरों, फनकारों की बीच बिल्कुल सप्तक की शक्ल में बजती रहती है. आप थोड़ी देर खड़े होकर महसूस कीजिएगा, आपको लगेगा कि इन सबके लिए ये ज्यादा मायने नहीं रखता कि रेडियो से आवाज आ रही है या नहीं, क्या प्रसारित हो रहा है..मायने बस ये रखता है कि उनकी तेज आती-जाती सांसों के बीच एक तरंगधैर्य है जो एक-एक सांस के साथ अपनी फ्रीक्वेंसी फिट कर रहा है.
हम मीडिया की कक्षाओं में रेडियो की न जाने कितनी विशेषताएं लिखाते-पढ़ाते हैं लेकिन मुझे हमेशा लगता है कि आधे घंटे के लिए छात्र को दर्जी, लुहार, बढ़ई या पान पर कत्था लगाते पनबाड़ी के साथ कर दिया जाए तो फिर उन्हें अलग से कुछ भी बोलने-बताने की जरूरत नहीं होगी. 87 साल के इस रेडियो को बहुत-बहुत मुबारकवाद. ये हमारे बीच इसी तरह धड़कता रहे तमाम नए तामझाम के आने के बावजूद.

बेबाक मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के एफबी वॉल से 
रेडियो एफ एम



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