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पराधीन सपनेहु सुख नाहीं।( Date : 26-10-2014)

आज गणेशशंकर विद्यार्थी का जन्मदिन है। साल १८९० में आज के ही रोज वे पैदा हुए थे। विद्यार्थी जी को एक प्रखर पत्रकार के रूप में याद किया जाता है पर वे महज एक सामान्य पत्रकार नहीं थे। वे निरंतर सांप्रदायिकता के खिलाफ लोहा लेने वाले जुझारू स्वयं सेवक थे, मजदूर और किसानों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर वे लड़े थे। उन्होंने कांग्रेस में रहते हुए भी भगत सिंह समेत तमाम क्रांतिकारियों को शरण दी थी और 101 साल पहले प्रताप अखबार निकाला था। आज के तमाम छुटभैये संपादकों की तरह वे कोई प्रोफेशनल नहीं बल्कि अखबार उनके लिए एक मिशन था। आजादी के लिए निरंतर संघर्ष करते रहने का। २५ मार्च सन् १९३१ को वे कानपुर के चौबेगोला स्थित मोहल्ले से एक हिंदू परिवार को निकाल कर ला रहे थे उसी समय अँग्रेजों के दलाल एक गुंडे ने उन्हें छुरा भोंक दिया। जब उन्हें छुरा भोंका गया तो आसपास के तमाम मुस्लिम बुजुर्ग उन्हें बचाने के लिए दौड़े पर तब तक वह गुंडा विद्यार्थी जी को छुरा घोप चुका था। उनकी मैयत में कहते हैं लाखों लोग शरीक हुए और कसमें खाईं कि बस अब कानपुर में हिंदू मुस्लिम दंगा नहीं होगा। उन्हीं की याद में कानपुर में होली के बाद गंगा मेला लगता है जिसमें हिंदू मुस्लिम दोनों अपने-अपने पंडाल लगाते हैं और अबीर लगाकर गले मिलते हैं। मालूम हो कि पाकिस्तान बनने के पहले मुस्लिम लीग भी वहां अपना पंडाल लगाती थी। 
वे आजादी के लिए लगातार संघर्ष करते रहे। उनका प्रताप इसके लिए एक हथियार भर था। प्रताप में मास्ट हेड के ऊपर छपा करता था-
"कर बिचार देखहु मन माही, पराधीन सपनेहु सुख नाहीं।"
(कानपुर में प्रताप के पहले प्रताप नारायण मिश्र भी पत्र निकाल चुके थे। लेकिन प्रताप ने ऐसी धूम मचाई कि जल्दी ही वह साप्ताहिक से दैनिक हो गया। प्रताप उनकी मृत्यु के बाद भी चलता रहा और उनके पुत्र हरिशंकर विद्यार्थी ने उसकी आँच मंद नहीं होने दी। पर आजादी के बाद बौने लोगों ने पत्रकारिता और पत्र निकालने की कमान संभाल ली। पहले तो उन्होंने जमीन से जुड़े लोगों को काटा और फिर दलाल पत्रकारों की पौध पनपाई। सोचिए कि आज कितने लोग हैं जिन्हें गणेश शंकर विद्यार्थी की पंक्ति में रखा जा सकता है।


वरिष्ठ  पत्रकार शम्भूनाथ  शुक्ल के एफबी वॉल से 
पत्रकारिता शिक्षण



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